डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस से जुड़ा है।
यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उठाया। उन्होंने बताया कि छात्र को पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस दिया गया था।
वकील के मुताबिक, यह कार्रवाई तब की गई, जब सुप्रीम कोर्ट छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर रद्द कर चुका है और छात्रों के खिलाफ भविष्य में किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है।
- Advertisement -
विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)
कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसमें पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उनसे पांच लाख रुपये का निजी मुचलका क्यों न लिया जाए। इसके अलावा दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी।
वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस पर अमल होने वाला था। हालांकि, बाद में मामला प्रेस में आने के बाद इसे वापस ले लिया गया। वकील ने कहा कि अधिकारियों की ऐसी कार्रवाई छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा कर सकती है।
दरअसल, चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे।
- Advertisement -
विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)
उन पर छात्रों को कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए उकसाने का भी आरोप लगाया गया। पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि उनकी कथित गतिविधियों से काफी तनाव पैदा हुआ।
इससे लड़ाई-झगड़े और शांति भंग होने की आशंका भी जताई गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
नोटिस वापस लिए जाने की बात पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि अब कार्रवाई का आधार क्या बचता है। इस पर वकील ने कहा कि नोटिस वापस लेने से कथित अवमानना खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा से जुड़ा मामला बताया।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया।
सीजेआई ने कहा, ‘मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? हमने साफ कहा था कि किसी छात्र के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई मजिस्ट्रेट हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।’








