रांची- राज्य के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) राजीव रंजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने अपना इस्तीफा मुख्य सचिव को भेज दिया है. महाधिवक्ता कार्यालय की ओर से भी उनके इस्तीफे की पुष्टि की गई है.
हालांकि, अभी तक उनके इस्तीफे के पीछे की वजह सार्वजनिक नहीं हुई है. ऐसे में राजनीतिक और कानूनी हलकों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं.
राजीव रंजन फरवरी 2020 से झारखंड के महाधिवक्ता के पद पर कार्यरत थे. राज्य में 2019 विधानसभा चुनाव के बाद बनी हेमंत सोरेन सरकार ने उन्हें 7 फरवरी 2020 को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त किया था.
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इस पद पर रहते हुए उन्होंने झारखंड सरकार की ओर से कई महत्वपूर्ण संवैधानिक, प्रशासनिक और नीतिगत मामलों में उच्च न्यायालय तथा अन्य न्यायिक मंचों पर पक्ष रखा.
इधर, महाधिवक्ता राजीव रंजन के इस्तीफे पर भारतीय जनता पार्टी ने हेमंत सरकार पर जोरदार हमला बोला है. भाजपा प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने कहा कि झारखंड में शासन नहीं, बल्कि “म्यूजिकल चेयर” का खेल चल रहा है, जहां किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का भविष्य सुरक्षित नहीं है.
भाजपा ने मांग की है कि राजीव रंजन के पूरे कार्यकाल का श्वेत पत्र जारी किया जाए. सरकार यह सार्वजनिक करे कि उनके कार्यकाल में राज्य सरकार ने कुल कितने मुकदमे जीते, कितने हारे, बाहरी वकीलों और कानूनी सलाहकारों पर कितना खर्च किया गया और इन खर्चों से राज्य को क्या लाभ मिला.
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साथ ही सरकार यह भी स्पष्ट करे कि यदि महाधिवक्ता का कार्यकाल संतोषजनक था तो उनका इस्तीफा क्यों हुआ और यदि संतोषजनक नहीं था तो उन्हें इतने लंबे समय तक पद पर क्यों बनाए रखा गया.
राजीव रंजन को संवैधानिक कानून, सेवा कानून, श्रम कानून, कंपनी कानून तथा दीवानी और आपराधिक मामलों का व्यापक अनुभव है. वे इससे पहले वर्ष 2011 से 2012 तक झारखंड के अपर महाधिवक्ता (एडिशनल एडवोकेट जनरल) भी रह चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने राज्य सरकार के अधिवक्ता और गृह विभाग के विशेष अधिवक्ता के रूप में भी जिम्मेदारियां निभाई हैं.








