पटना- पटना हाईकोर्ट ने एक मील का पत्थर साबित होने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि पेशेवर कानूनी राय देने के लिए किसी वकील पर आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता है.
जस्टिस राणा विक्रम सिंह की पीठ ने 35 साल के अनुभवी वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और एफआईआर को रद्द कर दिया. कोर्ट ने व्यवस्था दी कि केवल राय गलत साबित होने से वकील को जालसाज या साजिशकर्ता नहीं माना जा सकता है.
जैसे डॉक्टर मरीज को शत-प्रतिशत ठीक होने की गारंटी नहीं दे सकता, वैसे ही वकील भी सौ फीसदी बेदाग फैसले का आश्वासन नहीं दे सकता है. एक वकील का कर्तव्य अपने मुवक्किल के प्रति निष्ठा रखना है. यदि उसकी राय बाद में गलत निकलती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह साजिश में शामिल था.
- Advertisement -
विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)
उन्होंने लैटिन सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि, वकील कानून का रक्षक होता है, न कि अपराध में भागीदार. प्रशासनिक न्याय प्रणाली की मांग है कि वकील को बिना किसी अनावश्यक मुकदमेबाजी के डर के अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को निर्भीक होकर निभाने दिया जाए. जब तक स्वतंत्र धोखाधड़ी न हो, उसे संरक्षण प्राप्त है.
जस्टिस सिंह ने चेताया कि अगर हर गलत कानूनी राय पर वकील को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा, तो कोई भी वकील बिना डर और पक्षपात के अपनी सलाह नहीं दे सकेगा. डर के माहौल में कोई वकील खुलकर सलाह नहीं दे पाएगा, जो पूरी न्याय वितरण प्रणाली के लिए विनाशकारी होगा.
यह मामला साल 2008 का है, जब यूको बैंक (UCO Bank) की एग्जीबिशन रोड शाखा में फर्जी कागजातों के आधार पर लाखों रुपये का कैश-क्रेडिट लोन स्वीकृत किया गया था. बाद में जब लोन खाते एनपीए हो गए और बैंक को लगभग 29.54 लाख रुपये का नुकसान हुआ, तो बैंक मैनेजरों के साथ पैनल वकील को भी आरोपी बना दिया गया.
- Advertisement -
विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)
वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल को आईपीसी की धारा 420, 406, 467, 468, 471 और 120बी के तहत आरोपी बनाया गया था. निचली अदालत (ACJM पटना) ने 2016 में इस मामले पर संज्ञान भी ले लिया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने इस पर कड़ी टिप्पणियां कीं.
रिकॉर्ड खंगालने पर कोर्ट ने पाया कि, वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अपनी लीगल रिपोर्ट में बैंक को साफ-साफ लिखा था कि कागजात देखकर राय दी जा रही है. बैंक को खुद भी अपने स्तर पर इनका सत्यापन कर लेना चाहिए. इसके बावजूद उन्हें मुकदमे में घसीटा गया, जो पूरी तरह से द्वेषपूर्ण था.
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सख्त नाराजगी जताई कि निचली अदालत (ACJM पटना) ने संज्ञान आदेश कैसे पारित किया था. आदेश का पूरा प्रारूप कोर्ट के किसी क्लर्क या स्टाफ ने लिखा था और नीचे खाली जगह छोड़ी थी, जिसमें जज साहब ने केवल कुछ शब्द खुद भरकर दस्तखत कर दिए थे.
कोर्ट ने कहा कि, किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन दांव पर लगा होता है, जब उसे समन भेजा जाता है. मजिस्ट्रेट को अपना न्यायिक दिमाग लगाना चाहिए न कि किसी क्लर्क के लिखे पर पन्ना भरकर औपचारिक साइन कर देने चाहिए.
पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों जैसे, CBI बनाम के नारायण राव और स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल का हवाला देते हुए वकील के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया. अंत में जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने अपने लॉ क्लर्क्स और रिसर्च असिस्टेंस की सराहना की.








