पटना- सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार के पंचायती राज मंत्री के रूप में दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है.
यह चुनौती उन्हें बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुने दोबारा मंत्री बनाए जाने के खिलाफ दी गई है. इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की.
पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा अधिवक्ता सान्या कौशल के माध्यम से दायर याचिका पर नोटिस जारी करने का निर्णय लिया है. इस याचिका में राज्य सरकार, दीपक प्रकाश, कैबिनेट सचिव और भारत चुनाव आयोग (ECI) को प्रतिवादी बनाया गया है.
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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जैसे ही याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह के वकीलों ने अपनी दलीलें पेश करना शुरू किया, कोर्ट ने सबसे पहले असल स्थिति जानने की कोशिश की। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने पूछा, “क्या दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद पर हैं? अभी क्या स्थिति है?”
जिस पर याचिकाकर्ता के वकील सुदीप चंद्रा ने जवाब देते हुए बताया कि दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं। हाल ही में बिहार विधान परिषद (MLC) की 10 सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी हुई, फिर भी उन्हें किसी भी सीट के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इसके बावजूद वह गैर-कानूनी तरीके से अपने पद पर बने हुए हैं।
याचिकाकर्ता के वकील सुदीप चंद्रा ने बिहार सरकार के उस कदम का ज़िक्र किया जिसके खिलाफ उन्होंने ‘को वारंटो’ की रिट दायर की है। उन्होंने बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे 14 नवंबर 2025 को घोषित हुए और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी।
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उस कैबिनेट में दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया, जबकि वे न तो MLA थे और न ही MLC। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत, उनके लिए छह महीने के भीतर यानी 19 या 20 मई 2026 तक किसी भी सदन का सदस्य बनना अनिवार्य था।
वकील ने आगे कहा कि इस बीच बिहार में सरकार बदल गई और सम्राट चौधरी नए मुख्यमंत्री बने। नई सरकार बनने की प्रक्रिया के दौरान दीपक प्रकाश 15 अप्रैल से 6 मई तक लगभग 22 दिनों के लिए मंत्री नहीं रहे। हालांकि, जब 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी कैबिनेट का विस्तार हुआ, तो दीपक प्रकाश ने फिर से पंचायती राज मंत्री के तौर पर शपथ ली। यह संविधान की भावना का खुला उल्लंघन है।
वकील ने आगे तर्क दिया कि इस तरह तो कोई भी व्यक्ति MLA या MLC बने बिना मंत्री बना रह सकता है। कोई व्यक्ति 5 महीने और 28 दिनों तक मंत्री पद पर रहेगा, इस्तीफ़ा देगा और फिर से 5 महीने और 28 दिनों के लिए मंत्री बन सकता है।
अनुच्छेद 164(4) के तहत दी गई छूट का लाभ जीवन में केवल एक बार ही उठाया जा सकता है। इसे बार-बार किश्तों में या बनावटी अंतराल बनाकर रीसेट नहीं किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में न सिर्फ़ मंत्री पद पर हुई नियुक्ति को चुनौती दी गई है, बल्कि कई अन्य मांगें भी रखी गई हैं। जैसे कि इसमें मांग की गई है कि 7 मई को पद संभालने के बाद से पंचायती राज विभाग के तहत दीपक प्रकाश द्वारा जारी सभी प्रस्तावों, आदेशों या योजनाओं को तुरंत रद्द किया जाए।
इसके अलावा, इसमें मांग की गई है कि इस गैर-कानूनी नियुक्ति के कारण उन्हें मिले वेतन, भत्ते और सरकारी सुविधाओं को तुरंत बंद किया जाए और इन लाभों की वसूली भी की जाए।








