रांची- झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को झारखंड हाईकोर्ट ने टेंडर कमीशन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में किसी भी तरह की राहत देने से साफ इनकार कर दिया है.
अदालत ने पूर्व मंत्री की डिस्चार्ज पिटीशन को खारिज कर दिया है. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने विशेष पीएमएलए (PMLA) कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ आरोप गठन (फ्रेमिंग ऑफ चार्ज) की कार्रवाई को बिल्कुल सही ठहराया है.
याचिका में आलमगीर आलम की ओर से प्रवर्तन निदेशालय द्वारा पीएमएलए की धारा 50 के तहत दर्ज किए गए बयानों की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए गए थे. इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पीएमएलए की धारा 50 के तहत बयान दर्ज करने की प्रक्रिया एक न्यायिक कार्यवाही है, न कि कोई सामान्य पुलिसिया जांच.
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इसलिए इस बयान पर पूरी तरह विश्वास किया जाना चाहिए. कोर्ट ने साफ किया कि आपराधिक गतिविधियों के जरिए कमाए गए काले धन की जांच के दौरान ईडी द्वारा समन भेजना और बयान दर्ज करना पूरी तरह से कानूनी है, क्योंकि यह कार्रवाई पुलिस द्वारा नहीं की जाती है.
प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में पूर्व मंत्री को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. इसके मुताबिक आलमगीर आलम जब ग्रामीण विकास मंत्री थे, तब विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले निर्माण कार्यों के टेंडर में बकायदा एक फिक्स ‘सिस्टम’ के तहत ठेकेदारों से कमीशन वसूला जाता था. ईडी की चार्जशीट के अनुसार, इस पूरे रैकेट और कमीशनखोरी के जरिए कुल 37.55 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की गई थी.
सभी कानूनी पहलुओं, गवाहों के बयान और पुख्ता सबूतों को देखने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पूर्व मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं और निचली अदालत (PMLA कोर्ट) की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है.
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